जहां कभी ठंड थी, वहां अब बीमारी! जानिए जलवायु परिवर्तन कैसे फैला रहा है नया मलेरिया संकट

जर्नल ‘Nature’ की रिपोर्ट: हाल ही में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन सब-सहारा अफ्रीका में बच्चों में होने वाले मलेरिया के भौगोलिक पैटर्न को बदल रहा है।

ठंडे इलाकों में बढ़ा खतरा: ग्लोबल वार्मिंग के कारण ईस्ट अफ्रीका के पहाड़ी क्षेत्रों (Highlands) और साउदर्न अफ्रीका जैसे पहले से ठंडे इलाके अब मच्छरों के पनपने के अनुकूल हो गए हैं।

हॉटस्पॉट्स का बदलाव: वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन मलेरिया को केवल घटा या बढ़ा नहीं रहा, बल्कि इसके हॉटस्पॉट्स को नए क्षेत्रों में शिफ्ट कर रहा है।

अत्यधिक गर्म क्षेत्रों में राहत: वेस्ट अफ्रीका और साहेल के कुछ बेहद गर्म निचले इलाकों में तापमान बहुत अधिक बढ़ने के कारण मच्छरों का जीवन चक्र प्रभावित हुआ है, जिससे वहां मामले घट रहे हैं।

मच्छरों का अनुकूल तापमान: रिसर्च के अनुसार, मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों का संक्रमण 25°C के आसपास सबसे अधिक होता है, जबकि 16°C से कम या 34°C से अधिक तापमान पर यह घटने लगता है।

ईस्ट अफ्रीकन हाइलैंड्स में मामले बढ़े: इथियोपिया जैसे देशों के उच्च पर्वतीय इलाकों में तापमान बढ़ने के कारण 1900 के बाद से बच्चों में मलेरिया के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।

2100 तक का अनुमान: रिफ्ट वैली और तटीय साउदर्न अफ्रीका जैसे नए संवेदनशील इलाकों में इस सदी के अंत तक मलेरिया का जोखिम लगभग 20% तक बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव: जिन नए इलाकों में बीमारी फैल रही है, वहां ऐतिहासिक रूप से मलेरिया कम होने के कारण स्वास्थ्य ढांचा और तैयारी बेहद कम है।

2°C तापमान सीमा का महत्व: यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे सीमित रखा जाता है, तो उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में प्रति 1,000 बच्चों पर औसतन 5 अतिरिक्त मामलों को रोका जा सकता है।

रणनीति में बदलाव जरूरी: विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु को देखते हुए देशों को अपनी बीमारी निगरानी (Surveillance) और मच्छर नियंत्रण (Vector-control) कार्यक्रमों को पुनर्गठित करना होगा।