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बदलता बांग्लादेश: शेख हसीना के बाद अब भारत का ‘मित्र’ नहीं रहा पड़ोसी? जानिए क्या हैं मौजूदा हालात

  1. बदलता बांग्लादेश: शेख हसीना के बाद अब भारत का ‘मित्र’ नहीं रहा पड़ोसी? जानिए क्या हैं मौजूदा हाला

नई दिल्ली/ढाका:
दक्षिण एशिया की राजनीति में पिछले कुछ महीनों में जो सबसे बड़ा भूचाल आया है, उसका केंद्र बांग्लादेश है। वह बांग्लादेश, जिसे हम कुछ महीने पहले तक भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार और मित्र राष्ट्र मानते थे, आज पूरी तरह बदल चुका है। शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद ढाका में जो नई राजनीतिक हवा बह रही है, उसने नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
अगस्त 2024 में हुए तख्तापलट और उसके बाद बनी अंतरिम सरकार के फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह वह बांग्लादेश नहीं है, जिसे भारत “सोनाली अध्याय” (स्वर्णिम अध्याय) का हिस्सा मानता था।
1. राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथ का उदय
शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद, नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। हालांकि, उम्मीद थी कि इससे शांति लौटेगी, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
* देश में ‘जमात-ए- इस्लामी’ जैसे कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, जिन पर पहले प्रतिबंध था।
* शेख हसीना की पार्टी ‘अवामी लीग’ के नेताओं पर लगातार मुकदमे और हमले हो रहे हैं, जिससे वहां एक राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है।
* कानून व्यवस्था की स्थिति अब भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं है, जिसका असर आम जनजीवन पर पड़ रहा है।
2. भारत के साथ रिश्तों में आई ‘बर्फबारी’
सबसे बड़ा बदलाव कूटनीतिक स्तर पर देखने को मिला है। जो बांग्लादेश भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी प्रथम) नीति का सबसे मजबूत स्तंभ था, अब वहां से भारत विरोधी स्वर उठ रहे हैं।
* परियोजनाओं पर संकट: अडाणी पावर डील की समीक्षा हो या भारत द्वारा वित्तपोषित परियोजनाएं, नई सरकार हर उस समझौते पर सवाल उठा रही है जो भारत के पक्ष में था।
* बयानबाजी: अंतरिम सरकार के कई सलाहकारों के बयान भारत के प्रति तल्खी जाहिर करते हैं। वे भारत पर शेख हसीना को शरण देने को लेकर भी लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
* कूटनीतिक दूरी: दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय संवाद फिलहाल थमा हुआ है, जो रिश्तों में आई खटास को दर्शाता है।
3. अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: सबसे बड़ी चिंता
भारत के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा है।
* तख्तापलट के बाद दुर्गा पूजा पंडालों, मंदिरों और हिंदू घरों पर हमलों की कई खबरें सामने आईं।
* हाल ही में इस्कॉन (ISKCON) और चिन्मय कृष्ण दास जैसे मुद्दों को लेकर विवाद गहराया है।
* भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है, लेकिन ढाका का रवैया इसे ‘अतिशयोक्ति’ बताने का रहा है, जिससे विश्वास की कमी और बढ़ी है।
4. आर्थिक चुनौतियां
राजनीतिक उथल-पुथल ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। कपड़ा उद्योग (Garment Industry), जो बांग्लादेश की रीढ़ है, हड़तालों और हिंसा के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। महंगाई चरम पर है और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव है।
निष्कर्ष: भारत का रुख
मौजूदा हालात को देखते हुए भारत ने ‘वेट एंड वॉच’ (Wait and Watch) की नीति अपनाई है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह बांग्लादेश की जनता के साथ है, लेकिन अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमाओं की अखंडता से समझौता नहीं करेगा।
आज का बांग्लादेश अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ढाका और दिल्ली के बीच का वह गर्मजोशी भरा रिश्ता, जो पिछले 15 सालों में बना था, अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। भविष्य के रिश्ते इस बात पर निर्भर करेंगे कि बांग्लादेश कट्टरपंथ को रोकता है या उसकी चपेट में पूरी तरह आ जाता है।